MUHAMMAD NABINA NAAT LYRICS

MUHAMMAD NABINA NAAT LYRICS

 

MUHAMMAD NABINA NAAT LYRICS
MUHAMMAD NABINA NAAT LYRICS

 

MUHAMMAD NABINA NAAT LYRICS
Muhammad nabina
Binuru atina
Min Makkah Habibi nuru sata’ aal Madinah
Min salla Salatu, wet’hala bsifatu
Ya bakht elli fdhelou mechi, yechfa’alu fimamatu


Muhammad our prophet guides us with his light
From Makkah, O Beloved his light was glowing over Madinah
He who prays his prayers and tries to imitate his attitudes
Oh how lucky he is who walks in his presence
And gains his intercession after death

Ya Imamna ya Ameen
Ya sanad lil muslimeen
Ya Habibi ya Muhamad ya Ibn Abdullah.
Tammet irrisalat tamam, wel Habib Misk Elkhitam
Tul hayati wfslati bad’i assalli warah


Oh our Imam, the trustworthy One
Oh guardian & support to all Muslims
Oh my beloved Muhammad (s.a.w), the son of Abdullah
You completed the prophecies completely
And the Beloved One is the sweetest seal (of the Prophets)

Min awel youm fi o’mri, seme’t abuya wommi bisallu aalih
Allah umma salli aalih
Habbibni fil Iman, hassesni bil amen, we t’ala’t bih
Allahuma salli wasallem wabarek aalih
Allahuma salli wasallem wabarek aalih
Nefsi achufak fil manam… ya Rasulallah.
waabki aala kitfak wanam… ya habiballah.
wanul charaf lu’a sohbitak
wakhatti fi sfuf ummitak
wat’hama fik

 

Muhammad Nabina Lyrics

Naat Title Muhammad Nabina
Naat Artist Ayisha Abdul Basith
Click Here To Download Muhammad Nabina Lyrics
Muhammad Nabina Lyrics
Muhammad Nabina Naat Lyrics

Binuru Hadina
Min Makkah Habibi Nuru
Sata’al Madinah
Min Solla Solatuh
With’halab Sifatuh
Ya Bakhtilif Duluh Ma’shi
Yushfa’lu Fi Mamatuh
Mohammad Nabinaa
Binuru Hadina
Min Makkah Habibi Nuru
Sata’al Madinah
Min Solla Solatuh
Wit’halab Sifatuh
Ya Bakhtilif Duluh Ma’shi
Yushfa’lu Fi Mamatuh
Ya Imamna Ya Amin
Ya Sanad Lil Muslimin
Ya Habibi Ya Muhammad
Ya-bna Abdillah
Tammiti Risalah Tamam
Wal Habib Miskil Khitam
Thul Hayati Wufsolati
Bada’a Solli Waro
Muhamad Naabina
Binuru Hadina
Min Makkah Habibi Nuru
Sata’al Madinah
Min Solla Solatuh
Wit’halab Sifatuh
Ya Bahtilif Duluh Ma’shi
Yushfa’lu Fi Mamatuh
Min Awwil Yaumfa ‘umri
Sam’atabu Ya ‘ummi
Bi Sollu ‘alaik
(Allahumma Solli ‘alaik)
Habbibni Fil Iman
Hassisni Bil Aman
Wata’alat Thibi
(Allahumma Solli Wasallim Wabarak ‘alaih)
(Allahumma Solli Wasallim Wabarak ‘alaih)
Nafsi Ashufak Fil Manam…
(Ya Rasulallah)
Waabki ‘ala Kitfak Wanam…
(Ya Habiballah)
Wanul Sharaf Lu’a Sohbitak
Wakhatti Fi S’fuf Ummitak
Wat’hama Fik
Muhammad Nabina
Binuru Hadina
Min Makkah Habibi Nuru
Sata’al Madinah
Ya Habibi Ya To-ha
Ya Nagat Mil Mataha
Ghayyart Ad-donya Fa ‘inina
Bin Lilau Dhu’haha
Min Solla Solatu,
Wit’khalab Sifatu
Ya Bakhtil-lif Dhulou M’ashi,
Yushfa’alu Fi Mamatu

 

 

Muhammad Nabina Lyrics in Arabic


محمدا نبينا بنوره هدينا
من مكة حبيبى نوره
سطا على المدينة
من صلى صلاته
واتحلى بصفاته
يابخت اللى فى ضله ماشى
يشفعله في مماته
يا امامنا يا امين
ياسند للمسلمين
ياحبيبى يامحمد
يا ابن عبد الله
تمت الرسالات تمام
والحبيب مسك الختام
طول حياتى وفى صلاتى
بدعى اصلى وراه
من اول يوم فى عمرى
سمعت ابويا وامى
بيصلوا عليك
اللهم صلى عليك الله
حببنى فى الايمان
حسسنى بالامان
واتعلقت بيه
اللهم صلى وسلم و بارك عليه
نفسى اشوفك فى المنام
يا رسول الله
وابكى على كتفك وانام
ياحبيب الله
وانول شرف لقى صحبتك
واخطى فى صفوف امتك
واتحامى فيك
ياحبيبى ياطه
يا نجا من المتاهة
غيرت الدنيا فى عنينا
بين الليلة وضحاه

 


 

 


Muhammad nabina
Binuru atina
Min Makkah Habibi nuru sata’ aal Madinah
Min salla Salatu, wet’hala bsifatu
Ya bakht elli fdhelou mechi, yechfa’alu fimamatu


Muhammad our prophet guides us with his light
From Makkah, O Beloved his light was glowing over Madinah
He who prays his prayers and tries to imitate his attitudes
Oh how lucky he is who walks into his presence
And gains his intercession after death

Ya Imamna ya Ameen
Ya sanad lil muslimeen
Ya Habibi ya Muhamad ya Ibn Abdullah.
Tammet irrisalat tamam, wel Habib Misk Elkhitam
Tul hayati wfslati bad’i assalli warah


Oh our Imam, the trustworthy One
Oh guardian & support to all Muslims
Oh my beloved Muhammad (s.a.w), the son of Abdullah
You completed the prophecies completely
And the Beloved One is the sweetest seal (of the Prophets)

Min awel youm fi o’mri, seme’t abuya wommi bisallu aalih
Allah umma salli aalih
Habbibni fil Iman, hassesni bil amen, we t’ala’t bih
Allahuma salli wasallem wabarek aalih
Allahuma salli wasallem wabarek aalih
Nefsi achufak fil manam… ya Rasulallah.
waabki aala kitfak wanam… ya habiballah.
wanul charaf lu’a sohbitak
wakhatti fi sfuf ummitak
wat’hama fik


Throughout all my life and in my prayers, I make a supplication to pray behind him [in the next life]
From the first day of my life, I heard my mother and father praying to him
He endeared my faith to me, granted peace to me & made me love him
Oh Allah send blessings & peace upon him
Oh Allah send blessings & peace upon him
I wish to see you in my dreams, O Messenger of God
And I cry on your shoulder & sleep there, o Beloved of God
And I attain honor with your accompaniment
And I walk among the ranks of your Ummah
And I am protected by you

Ya Habibi ya Taha, ya nagat mel mataha
Ghayart edonya fi I’inina bin lila wdhu’haha
Min salla Salatu, wet’hala bsifatu
Ya bakht elli fdhelou mechi, yechfa’alu fimamatu


Oh Beloved, o Pure One, you who had survived the maze
You changed the world in our eyes between a night and its morning [referring to the night journey]
He who prays his prayers and tries to improve his attributes
How lucky is he who walks in his shadow
And adds to him his death

 

फर्ज उलूम सीरीज (पार्ट 152)

दूर से सुनना और देखना अल्लाह की सिफत है ??

दूर से देखना और सुनना हरगीज़ अल्लाह पाक की सिफ़त नहीं, क्योंकि दूर से तो वो देखता और सुनता है जो पुकारने वाले से दूर हो, जबकी अल्लाह पाक तो अपने बंदों के क़रीब है । जैसा कि सूरह अल बक़रह की आयत नं. 186 में ख़ुदा ए रहमान का फ़रमान है

और ऐ महबूब, जब तुमसे मेरे बंदे मेरे बारे में पूछें तो (कह दो) मे (उनके) क़रीब हूँ

इसी तरह, सूरह क़ाफ़ की आयत नं. 16 में इरशाद फ़रमाया

और हम दिल की रगों से भी उससे ज़्यादा क़रीब हैं

जब अल्लाह पाक इल्म और क़ुदरत के ऐतबार से अपने बंदों के क़रीब है, तो फिर दूर से देखना और सुनना उसकी सिफ़त कैसे हो सकती है?

अल्लाह करीम ने अपने बरगुज़ीदा बंदों को दूर से देखने, सुनने और तसर्रुफ़ करने की ताक़त अता फ़रमाई है, लिहाज़ा वह अल्लाह करीम की अता से दूर से देखते, सुनते और तसर्रुफ़ भी फ़रमाते हैं

जैसा कि बुखारी में हज़रत सय्यदुना अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत है कि नबी करीम ﷺ के ज़माना ए मुबारक में सूरज को ग्रहण लगा, तो आप ﷺ ने नमाज़ पढ़ी। (दौराने नमाज़ हाथ बढ़ाकर कुछ लेना चाहा लेकिन फिर हाथ मुबारक नीचे कर दिया। नमाज़ के बाद) सहाबा ए किराम ने अर्ज़ की: “या रसूलल्लाह ﷺ हमने देखा कि आप अपनी जगह से किसी चीज़ को पकड़ रहे थे, फिर हमने देखा कि आप पीछे हटे” आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: “मुझे जन्नत दिखाई गई तो मैं उसमें से (फलों का) एक गुच्छा तोड़ने लगा, अगर मैं उस गुच्छे को तोड़ लेता तो तुम रहती दुनिया (कयामत) तक उसमें से खाते रहते”

(صحیح البخاری ، الحدیث 748)”

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार खान अलैहिर रेहमा फ़रमाते हैं: इस हदीस से दो मसअले मालूम हुए, (1) हुज़ूर ﷺ जन्नत और वहाँ के फलों वग़ैरा के मालिक हैं, गुच्छा तोड़ने से रब ने मना न किया बल्की आप ने खुद न तोड़ा, और मालिक क्यों न हो कि रब करीम फ़रमाता है:
اِنَّآ اَعْطَيْنٰكَ الْكَوْثَرَ
इस लिए हुज़ूर ﷺ ने सहाबा को कौसर का पानी कई बार पिलाया

(2) दूसरा मसअला यह साबित हुआ कि हुज़ूर ﷺ को रब करीम ने वह ताक़त दी है कि मदीना में खड़े होकर जन्नत में हाथ डाल सकते हैं और वहाँ तसर्रुफ़ कर सकते हैं। जिनका हाथ मदीना से जन्नत में पहुँच सकता है क्या उनका हाथ हम जैसे गुनहगारों की दस्तगीरी के वास्ते नहीं पहुँच सकता ?

हदीस पाक और इसकी शरह से वाज़ेह तौर पर यह बात साबित होती है कि हमारे प्यारे सरकार, मक्के-
मदीने के ताजदार ﷺ को अल्लाह पाक ने बहुत से इख्तियारात (पावर) दिए है, जन्नत का मालिक बनाया है, और अल्लाह की अता से आप ﷺ ने ज़मीन पर खड़े होकर सातों आसमानों से भी ऊपर जन्नत को न सिर्फ देख लिया बल्कि अपना हाथ मुबारक भी जन्नत में (फलों के) गुच्छे तक पहुँचा दिया


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फर्ज उलूम सीरीज (पार्ट 153)

दूर से सुनना और देखना वलियो की सिफत है

सरकार ﷺ के सदके में सहाबा ए किराम और बुजुर्गाने दीन को भी दूर से देखने, सुनने और तसर्रुफ करने की कुव्वत हासिल है। चुनांचे हज़रत सैयदना उमर बिन हारिस से रिवायत है कि अमीरुल मुअमिनीन हज़रत सैयदना उमर फ़ारूके आज़म ने हज़रत सैयदना सारीया को इस्लामी लश्कर का सिपाहसालार बनाकर नहावन्द भेजा। हजरत सारीया जिहाद में मशगूल थे, इधर मदीना शरीफ में हज़रत सैयदना उमर फ़ारूके आज़म जुमा का ख़ुतबा फरमा रहे थे । यकायक आप ने ख़ुतबा छोड़कर तीन बार फ़रमाया:
“يَا سَارِيَةً الجبل”
यानी “ऐ सारीया, पहाड़ की तरफ़ जाओ” फिर इसके बाद ख़ुतबा शुरू फरमाया। बाद नमाज़ हज़रत सैयदना अब्दुर रहमान बिन औफ़ ने इस पुकार की वजह दरयाफ़्त की तो हजरत उमर ने फ़रमाया: “मैंने मुसलमानों को देखा कि वो पहाड़ के पास लड़ रहे हैं और कुफ्फार ने उन्हें आगे-पीछे से घेर रखा है, ये देखकर मुझसे ज़ब्त न हो सका और मैंने कह दिया: ऐ सारीया ! पहाड़ की तरफ़ जाओ।'” इस वाकये के कुछ रोज़ बाद हज़रत सैयदना सारीया का कासिद एक ख़त लेकर आया जिसमें लिखा था कि हम लोग जुमा के दिन कुफ्फार से लड़ रहे थे और क़रीब था कि हम शिकस्त खा जाते (हार जाते) लेकिन हमने जुमा की नमाज़ के वक्त किसी की आवाज़ सुनी (कोई कह रहा था) :ऐ सारीया, पहाड़ की तरफ़ जाओ।’ इस आवाज़ को सुनकर हम पहाड़ की तरफ़ चले गए तो अल्लाह ने कुफ्फार को शिकस्त दी, हमने उन्हें क़त्ल कर डाला, इस तरह हमें फतेह हासिल हो गई

(کنز العمال ، الحدیث 35783-35785)

हज़रत अल्लामा अफीफ़ुद्दीन अब्दुल्लाह याफ़’ई यमनी फ़रमाते हैं: इस हदीस शरीफ से हज़रत सैयदना उमर फ़ारूक़ अज़म की दो करामतें ज़ाहिर हुईं:
(1) आप ने मदीना मुनव्वरा से (1400 मील दूर तकरीबन 3500 किलोमीटर) मक़ामे नहावन्द में मौजूद लश्करे इस्लाम और उनके दुश्मन को मुलाहिज़ा फरमा लिया और
(2) मदीना तैय्यिबा से इतनी दूर आवाज़ पहुंचा दी

(روض الریاحین ، صفحہ 39)


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