एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है,
जो रब्ब-ए-दो-आलम का महबूब यगाना है।
एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है,
कल जिसने हमें पुल से ख़ुद पार लगाना है।
ज़हरा का वो बाबा है, हसनैन का नाना है।
एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
आओ दर-ए-ज़हरा पर फैलाए हुए दामन,
है नस्ल करीमों की लज्जा-पाल घराना है।
एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
उस हाशमी दूल्हा पर कौनैन को मैं वारूं,
जो हुस्न-ओ-शमाइल में यक्ता-ए-ज़माना है।
एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
इज़्ज़त से न मर जाएं क्यूँ नाम-ए-मुहम्मद पर,
यूं भी किसी दिन हमको दुनिया से तो जाना है।
एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
हूँ शाह-ए-मदीना की मैं पुश्त-पनाही में,
क्या इसकी मुझे परवा दुश्मन जो ज़माना है।
एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
सौ बार अगर तौबा टूटी भी तो क्या हैरत,
बख्शीश की रिवायत में तौबा तो बहाना है।
एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है।
महरूम-ए-करम इसको रखिए न सर-ए-महशर,
जैसा है नसीर आखिर साहिल तो पुराना है।
एक मैं ही नहीं, उन पर क़ुर्बान ज़माना है।