इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
क़दमों में अपने मुझ को सुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
‘इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
मैं क्या करूँगा सुन के ज़माने की हिदायत
वज्ह-ए-सुकून है शह-ए-जीलाँ की करामत
बर्तानिया, अफ़ग़ान से क्या लेना है मुझे
मौक़ा’ मिला तो देखना पूछूँगा एक बार
कब जाऊँगा ‘इराक़ बताओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
‘इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
ज़ुल्म-ओ-जफ़ा, सितम है, बलाओं का राज है
हम जिस में जी रहे हैं ये कैसा समाज है ?
ज़हरीली हो गई है फ़ज़ा इस तरह यहाँ
ग़ौस-उल-वरा से मेरी ये फ़रियाद आज है
दो गज़ ज़मीन दे के बसाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
‘इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
सारे बुरों में मैं हूँ बुरा तो बुरा सही
लेकिन तमाम अच्छों में अच्छा मिला तू ही
दादी है तेरी फ़ातिमा, दादा तेरे ‘अली
देखेंगी तेरा रौज़ा निगाहें ये कब मेरी
हसरत की आग मेरी बुझाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
‘इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
राहत-गुज़ीं जहाँ पे ख़ुदा हबीब है
देखा है जिस ने शहर-ए-नबी, ख़ुशनसीब है
अस्लाफ़ की किताब में तहरीर यही है
बग़दाद से हुदूद-ए-मदीना क़रीब है
मुझ को वहीं से तयबा दिखाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
‘इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
कुछ बद-तमीज़ बकते हैं वलियों की शान में
बाज़ार में, मकान में, अपनी दुकान में
पाबंदियाँ लगाइए उस की उड़ान में
लग जाए ताला आज ही उस की ज़बान में
तीर-ए-नज़र वहीं से चलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
‘इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
मैं ‘अंदलीब-ए-बाग़-ए-रिसालत बना फिरूँ
हर दिलरुबा के दिल का मैं दिलबर बना फिरूँ
बरसों से मेरे दिल की तमन्ना है बस यही
इक जलसा मैं ‘इराक़ में जा कर कभी पढ़ूँ
शोहरत में चार चाँद लगाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
‘इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
इस दिल से दूर आज ही रंज-ओ-अलम करो
मौला हसन-हुसैन के सदक़े करम करो
दुनिया पड़ी है पीछे तुम्हारे ग़ुलाम के
बढ़ता ही जा रहा है सितम, आप कम करो
तुम ज़ालिमों का ज़ोर मिटाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
‘इश्क़-ए-नबी का जाम पिलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बुलाओ ना, ग़ौस-ए-पाक !
बग़दाद मैं ने देखा नहीं है
ना’त-ख़्वाँ:
दिलबर शाही