आक़ा ! ले लो सलाम अब हमारा
सबा ! तू मदीने जा के कहना ख़ुदारा !
ग़म से हैं टूटे हुए, ज़ुल्मों से लूटे हुए
मुद्दत हुई या नबी, क़िस्मत को रूठे हुए
रोज़-ए-महशर उम्मती का आप ही सहारा
ग़म से हैं टूटे हुए, इस्याँ में डूबे हुए
कर दो करम या नबी ! हैं हाथ फैले हुए
रोज़-ए-महशर उम्मती का आप ही सहारा
चाँद के टुकड़े हुए, पेड़ों ने सज्दे किए
सूरज पलट आ गया, ये मो’जिज़े आप के
उम्मती क्या ख़ुद ख़ुदा है शैदा तुम्हारा
नूर-ए-ख़ुदा आप हैं, शाह-ए-हुदा आप हैं
ए सरवर-ए-अम्बिया ! बहर-ए-सख़ा आप हैं
है ये अज़मत रब ने तुम पर क़ुरआं उतारा
दिन-रात रोती है ये उम्मत तुम्हारे लिए
हो जाए नज़र-ए-करम आक़ा ! हमारे लिए
तयबा की गलियोँ का हम को हो अब नज़ारा
सब अम्बिया के इमाम, तुम पर हो लाखों सलाम
रौज़े पे आये मजीद, कहता है ये सुब्हो शाम
ज़िन्दगी में आस का ना टूटे सितारा
सलामी उस पर कि जिस ने बे-कसों की दस्तगीरी की
सलामी उस पर कि जिस ने बादशाही में फ़क़ीरी की
सलामी उस पर कि असरार-ए-मुहब्बत जिस ने सिखलाए
सलामी उस पर कि जिस ने ज़ख़्म खा कर फूल बरसाए
सलामी उस पर कि जिस ने ख़ून के प्यासों को क़बाएँ दीं
सलामी उस पर कि जिस ने गालियाँ सुन कर दुआएँ दीं
सलामी उस पर कि दुश्मन को हयात-ए-जावेदाँ दे दी
सलामी उस पर, अबू सुफ़ियान को जिस ने अमाँ दे दी
सलामी उस पर कि जिस का ज़िक्र है सारे सहाइफ़ में
सलामी उस पर, हुआ मजरूह जो बाज़ार-ए-ताइफ़ में
सलामी उस पर, वतन के लोग जिस को तंग करते थे
सलामी उस पर कि घर वाले भी जिस से जंग करते थे
सलामी उस पर कि जिस के घर में चाँदी थी ना सोना था
सलामी उस पर कि टूटा बोरिया जिस का बिछौना था
सलामी उस पर जो सच्चाई की ख़ातिर दुख उठाता था
सलामी उस पर, जो भूका रह के औरों को खिलाता था
सलामी उस पर, जो उम्मत के लिए रातों को रोता था
सलामी उस पर, जो फ़र्श-ए-ख़ाक पर जाड़े में सोता था
सलामी उस पर जो दुनिया के लिए रहमत ही रहमत है
सलामी उस पर कि जिस की जात फ़ख़्र-ए-आदमियत है
सलामी उस पर कि जिस ने झोलियाँ भर दीं फ़क़ीरों की
सलामी उस पर कि मुश्कें खोल दीं जिस ने असीरों की
सलामी उस पर कि जिस की चाँद तारों ने गवाही दी
सलामी उस पर कि जिस की संग पारों ने गवाही दी
सलामी उस पर, शिकस्तें जिस ने दीं बातिल की फ़ौजों को
सलामी उस पर कि जिस की संग पारों ने गवाही दी
सलामी उस पर कि जिस ने ज़िन्दगी का राज़ समझाया
सलामी उस पर कि जो ख़ुद बद्र के मैदान में आया
सलामी उस पर कि जिस का नाम लेकर इस के शैदाई
उलट देते हैं तख़्त-ए-क़ैसरीयत, औज-ए-दाराई
सलामी उस पर कि जिस के नाम लेवा हर ज़माने में
बढ़ा देते हैं टुकड़ा, सर-फ़रोशी के फ़साने में
सलामी उस जात पर, जिस के परेशाँ हाल दीवाने
सुना सकते हैं अब भी ख़ालिद ओ हैदर के अफ़साने
दरूद उस पर कि जिस की बज़्म में क़िस्मत नहीं सोती
दरूद उस पर कि जिस के ज़िक्र से सीरी नहीं होती
दरूद उस पर कि जिस के तज़किरे हैं पाक-बाज़ों में
दरूद उस पर कि जिस का नाम लेते हैं नमाज़ों में
दरूद उस पर, जिसे शम-ए-शबिस्तान-ए-अज़ल कहिये
दरूद उस जात पर, फ़ख़्र-ए-बनी आदम जिसे कहिये
