भर दो झोली या ख़्वाजा

भर दो झोली मेरी या मोहम्मद लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

कुछ नवासों का सदक़ा अता हो दर पे आया हूँ बन कर सवाली

हक़ से पाई वो शान-ए-करीमी, मर्हबा दोनों-आलम के वाली

उस की क़िस्मत का चमका सितारः जिस पे नज़र-ए-करम तू ने डाली

ज़िंदगी बख़्श दी बंदगी को आबरू दीन-ए-हक़ की बचा ली

वो मोहम्मद का प्यारा नवासा जिस ने सज्दे में गर्दन कटा ली

हश्र में उन को देखेंगे जिस दम उम्मती ये कहेंगे ख़ुशी से

आ रहे हैं वो देखो मोहम्मद जिन के कंधे पे है कमली काली

आशिक़-ए-मुस्तफ़ा की अज़ाँ में अल्लाह अल्लाह कितना असर था

अर्श वाले भी सुनते थे जिस को क्या अज़ाँ थी अज़ान-ए-बिलाली

काश ‘पुरनम’ दयार-ए-नबी में जीते-जी हो बुलावा किसी दिन

हाल-ए-ग़म मुस्तफ़ा को सुनाऊँ थाम कर उन के रौज़े की जाली

 

 

 

 

 

 

 

 

या ख़्वाजा मेरी झोली भर दो / Ya Khwaja Meri Jholi Bhar Do
मैं हूँ साइल, मैं हूँ मँगता
या ख़्वाजा ! मेरी झोली भर दो
हाथ बड़ा कर डाल दो टुकड़ा
या ख़्वाजा ! मेरी झोली भर दो

जो भी साइल आ जाता है
मन की मुरादें पा जाता है
मैं ने भी दामन है पसारा
या ख़्वाजा ! मेरी झोली भर दो

सुल्तान-ए-कौनैन का सदक़ा
मौला ‘अली हसनैन का सदक़ा
सदक़ा ख़ातून-ए-जन्नत का
या ख़्वाजा ! मेरी झोली भर दो

मुझ को ‘इश्क़-ए-रसूल ‘अता हो
ख़्वाजा ! नज़र-ए-करम से बना दो
शाह-ए-मदीना का दीवाना
या ख़्वाजा ! मेरी झोली भर दो

रब की ‘इबादत की दुश्वारी
और गुनाहों की बीमारी
दोनों आफ़तें दूर हों, ख़्वाजा !
या ख़्वाजा ! मेरी झोली भर दो

दे दो तुम ‘अत्तार को, ख़्वाजा !
सुन्नत की ख़िदमत का जज़्बा
हर-सू दीं का बजा दे डंका
या ख़्वाजा ! मेरी झोली भर दो

शायर:
मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी

ना’त-ख़्वाँ:
इमरान शैख़ अत्तारी
मेहमूद अत्तारी

 

mai.n hu.n saail, mai.n hu.n mangta
ya KHwaja ! meri jholi bhar do
haath ba.Da kar Daal do Tuk.Da
ya KHwaja ! meri jholi bhar do

jo bhi saail aa jaata hai
man ki muraade.n paa jaata hai
mai.n ne bhi daaman hai pasaara
ya KHwaja ! meri jholi bhar do

sultaan-e-kaunain ka sadqa
maula ‘ali hasnain ka sadqa
sadqa KHaatoon-e-jannat ka
ya KHwaja ! meri jholi bhar do

mujh ko ‘ishq-e-rasool ‘ata ho
KHwaja ! nazar-e-karam se bana do
shaah-e-madina ka deewana
ya KHwaja ! meri jholi bhar do

rab ki ‘ibaadat ki dushwaari
aur gunaaho.n ki bimaari
dono.n aafate.n door ho.n, KHwaja !
ya KHwaja ! meri jholi bhar do

de do tum ‘Attar ko, KHwaja !
sunnat ki KHidmat ka jazba
har-soo dee.n ka baja de Danka
ya KHwaja ! meri jholi bhar do

Poet:
Muhammad Ilyas Attar Qadri

Naat-Khwaan:
Imran Shaikh Attari
Mehmood Attari

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