समझना-यह-नहीं-आसां-कि-क्या

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

जिगर मुरादाबादी

जब मिली आँख होश खो बैठे
कितने हाज़िर-जवाब हैं हम लोग

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

हुस्न व इश्क का जिक्र आते ही जिगर मुरादाबादी का नाम बेसाख्ता ज़बान पर आ जाता है। मोहब्बत में महरूमी और मायूसी का सामना करने वाले जिगर की शायरी में ये एहसास शिद्दत से बयां होतें हैं,

हम इश्क के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है

इश्क़ में आशिक़ का हाल कैसा हो जाता है ये तो ज़माना जानता है लेकिन जिगर इसे अपने अंदाज़ में बयां करते हैं,

इब्तिदा वो थी कि जीना था मुहब्बत में मुहाल
इंतिहा ये है कि अब मरना भी मुश्किल हो गया

मुहब्बत में एक ऐसा वक़्त भी दिल पर गुज़रता है
कि आंसू ख़ुश्क हो जाते हैं तुगयानी नहीं जाती

जिगर की शायरी से पता चलता है कि मुहब्बत में एक वक्त ऐसा भी आता है,

मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं
कि मंजिल पे हैं और चले जा रहे हैं

ये कह कह के दिल को बहला रहे हैं
वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं

जिगर साहब का नाम पहली बार उस समय सुना जब मैं सातवीं कक्षा में था। मुझे इस शेर पर भाषण प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कहा गया था।

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

गुरु जी ने भाषण की तैयारी करा दी, बस इतना याद है कि तक़रीर पसंद की गई और ख़ूब तालियां बजीं। लेकिन जिगर के बारे में कुछ मालूम न हो सका सिवाय नाम के और यह कि वे बड़े शायर थे।

मुरादाबाद यूँ तो हर दौर में ज्ञान और साहित्य का सागर रहा है। जब पढ़ने के लिए मुरादाबाद गया तो इस शहर की अदब नवाजी के दर्शन हुए। उस समय कलेक्ट्रेट, तहसील रोड के सिनेमा घर का मुशायरा और छोटी-छोटी अदबी महफिलों में लोगों की जान बसती थी। सुना है पंचायत घर की प्रदर्शनी में भी इन यादों को संजोया जाता है। वहीं मेरी मुलाक़ात कई ऐसे लोगों से हुई जिन के सीने में जिगर की यादें महफूज़ थीं।

जिगर को अपने शहर से प्यार था और यहां के लोग भी उन्हें बहुत चाहते थे। जिगर के कई किस्से मशहूर हैं। वह अपनी ही धुन में रहने वाले क़लंदराना तबियत के इंसान थे। इस लिए उनके शिष्य कम थे। रब्त मुरादाबादी जिगर को अपना गुरु बताते हैं लेकिन वह उनके शिष्य नहीं थे। क़मर मुरादाबादी के बारे में कहा जाता है कि वह जिगर से अपनी ग़ज़लों पर इस्लाह लेते थे।

 

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