सेहर का वक़्त है, मासूम कलियाँ मुस्कुराती हैं,
हवाएं ख़ैर-ए-मक़दम के तराने गुनगुनाती हैं,
फ़रिश्तों की सलामी देने वाली फ़ौज गाती थी,
जनाब-ए-आमिना सुनती थीं, ये आवाज़ आती थी,
या नबी सलाम अलैका
या रसूल सलाम अलैका
या हबीब सलाम अलैका
सलवातुल्लाह अलैका
बख़्श दो जो चीज़ चाहो
क्यूँ कि महबूब-ए-ख़ुदा हो
मुस्तफ़ा हो मुज्तबा हो
जो कहूँ उससे सिवा हो
जाँ कनी के वक़्त आना
कलिमा-ए-तैयब पढ़ाना
मक्र-ए-शैताँ से बचाना
अपने दामन में छुपाना
वास्ता-ए-आल-ए-अबा का
सदक़ा हज़रत फ़ातिमा का
और शहीद-ए-कर्बला का
ग़म ना हो रोज़-ए-जज़ा का
रहमतों के ताज वाले
दो जहाँ के राज वाले
अर्श की मेराज वाले
आँसुओं की लाज वाले
जान कर काफ़ी सहारा
ले लिया है दर तुम्हारा
ख़ल्क़ के वारिस ख़ुदारा
लो सलाम अब तो हमारा
ऐ शहनशाह-ए-ज़माना
आपका ये आस्ताना
रहमतों का है ख़ज़ाना
हो निगाह-ए-मेहरबाना
ऐ शहनशाह-ए-मदीना
नूर से मामूर सीना
मुश्क से बेहतर पसीना
देख लें हम सब मदीना
आपका तशरीफ़ लाना
वक़्त भी कितना सुहाना
जगमगा उठा ज़माना
हूरेँ गाती हैं तराना
इतना करम शाह-ए-ज़मन हो
ख़ाली रूह से बदन हो
आपके शहर का कफ़न हो
और मदीने में दफ़न हो
कब वो आएगा महीना
जब चले अपना सफ़ीना
सू-ए-गुलज़ार-ए-मदीना
या मुझे बस साएलीना
मुस्तफ़ा ख़ैरुल वरा हो,
सरवर-ए-हर दो सरा हो,
अपने अच्छों का तसद्दुक़,
हम बद्दों को भी निबाहो
हो मुबारक अहल-ए-ईमान,
हो गई सुबह-ए-बहाराँ,
हो गया हर घर चराग़ाँ,
सलवातुल्लाह अलैका।
आमिना बीबी का जाया,
बारहवीं तारीख़ आया,
सुबह-ए-सादिक़ ने सुनाया,
सलवातुल्लाह अलैका
है ये हसरत दर पे आएँ
अश्क़ के दरिया बहाएँ
दाग़ सीने के दिखाएँ
सामने हो कर सुनाएँ
नूरी जाह रब ये दुआ कर
हम दर-ए-मौला से जा कर
पहले कुछ नातें सुना कर
ये पढ़ें सर को झुका कर
रंज-ओ-ग़म खाए हुए हैं
दूर से आए हुए हैं
तुम पे इतराए हुए हैं
हाथ फैलाए हुए हैं
वक़्त का चमके सितारा
हाज़िरीन का इशारा
देख कर रौज़ा प्यारा
फिर पढ़ें ख़ादिम तुम्हारा
जान कर काफ़ी सहारा
ले लिया है दर तुम्हारा
ख़ल्क़ के वारिस ख़ुदारा
यूँ सलाम अब तो हमारा
आप शाह-ए-इंस-ओ-जाँ हैं
बाइस-ए-कौन-ओ-मकाँ हैं
रहनुमा ये दो जहाँ हैं
पेशवा-ए-मुरसलीं हैं
नूर-ए-रब्बुल आलमीन हो
जलवा-ए-हक़्क़ुल यक़ीन हो
सरवर-ए-दुनिया-ओ-दीन हो
दिल में आँखों में मकीन हो
बादशाह-ए-अम्बिया हो
नूर-ए-ज़ात-ए-किबरिया हो
हामी-ए-रोज़-ए-जज़ा हो
ख़ल्क़ के मुश्किल कुशा हो
अर्श-ए-आज़म पर तुम्हीं हो
ख़ल्क़ के रहबर तुम्हीं हो
साक़ी-ए-कौसर तुम्हीं हो
शाफ़ी-ए-महशर तुम्हीं हो
तेरी आरज़ू में जीना
तेरी जुस्तजू में मरना
यही मेरी ज़िन्दगी है
यही मेरी बन्दगी है
दूर रहे ग़म का किनारा
सरवर-ए-आलम ख़ुदारा
दीजिये जल्दी सहारा
पार हो बेड़ा हमारा
मेरे मौला मेरे सरवर
है यही अरमान-ए-अकबर
पहले क़दमों पर रक्खें सर
फिर कहें ये सर उठा कर
अकबर-ए-शाद तुम्हारा
फिर रहा है मारा मारा
जा-ब-जा तुमको पुकारा
इसकी अब सुनलो ख़ुदारा
आशिक़-ए-मायल की सुनलो
बानी-ए-महफ़िल की सुनलो
सामईन के दिल की सुनलो
अकबर-ए-बिस्मिल की सुनलो
छोड़कर दामन तुम्हारा
और लें किसका सहारा
कौन है दाता हमारा
किसके दर पे हो गुज़ारा
आपके दर की फ़क़ीरी
दो जहाँ की है अमीरी
अब आ गया वक़्त-ए-पीरी
कीजियो लिल्लाह दस्तगीरी
पूरी या रब्ब, ये दुआ कर
हम दर-ए-मौला पे जाकर
पहले कुछ नातें सुना कर
फिर पढ़ें सर को झुका कर
लाए जो ईमान तुम पर
क्यों ना दें वो जान तुम पर
मेहरबाँ रहमान तुम पर
ख़ल्क़ सब क़ुर्बान तुम पर
हिज्र में मुश्किल है जीना
दिल हुआ चाक और सीना
थामिये मेरा सफ़ीना
या शाफ़ी अल-मुज़्नबीना
काश हासिल हो हुज़ूरी
दूर हो जाए ये दूरी
दिल की ये हसरत हो पूरी
देख लूँ वो शक्ल-ए-नूरी
दिल में तुम मसनद नशीन हो
इस मकान के तुम्हीं मकीन हो
हम मरें तो वो ज़मीन हो
और सिरहाने भी तुम ही हो
नूह के तुम नाख़ुदा हो
ख़ल्क़ के मुश्किल कुशा हो
सब के तुम हाजत रवा हो
जो कहूँ उससे सिवा हो
बख़्श दो मेरी ख़ताएँ
दूर हों ग़म की घटाएँ
भेज दो अपनी अताएँ
वज्द में हम यूँ सुनाएँ
हश्र में तुम बख़्शवाना
जब कहीं ना हो ठिकाना
अपने दामन में छुपाना
हर मुसीबत से बचाना
जाँ कनी के वक़्त आना
कलिमा-ए-तैयब पढ़ाना
चेहरा-ए-अनवर दिखाना
हमको ईमान पर उठाना
ऐ शाफ़ी-ए-रोज़-ए-महशर
है सियाह इस्याँ से दफ़्तर
ग़ौस का सदक़ा करम कर
चश्म-ए-दिल को करके मुनव्वर
ऐ सबा रौज़े पे जाना
दस्त बस्ता ये कह सुनाना
या नबी दर पे बुलाना
और जलवा-ए-ज़ेबा दिखाना
फ़ख़्र-ए-आदम फ़ख़्र-ए-हव्वा
फ़ख़्र-ए-नूह-ओ-फ़ख़्र-ए-याह्या
फ़ख़्र-ए-इब्राहिम-ओ-मूसा
फ़ख़्र-ए-इस्माईल-ओ-ईसा
ऐ शहनशाह-ए-रिसालत
है यहाँ जो अहल-ए-सुन्नत
दायमी सब पर हो रहमत
बानी-ए-महफ़िल पे बरकत
अस्सलाम ऐ जान-ए-आलम
अस्सलाम ईमान-ए-आलम
शाह-ए-दीन सुल्तान-ए-आलम
तुम से है सामान-ए-आलम
अस्सलाम ऐ शाह-ए-आलम
अस्सलाम उम्मत के वाली
झोली रह जाए ना ख़ाली
अर्ज़ करते हैं सवाली
क़तरा क़तरा दरिया दरिया
ज़र्रा ज़र्रा तारा तारा
जब हुए सरकार पैदा
सारा आलम कह रहा था
हश्र में सब इक किनारे
उम्मती थे दम को मारे
आ गए जब वो तो सारे
देख कर उनको पुकारें
इक झलक जो देख पाऊँ
जान मैं तुम पर लुटाऊँ
राह में आँखें बिछाऊँ
दस्त बस्ता फिर सुनाऊँ
नायब-ए-अशहाब-ओ-सरवर
पहले हैं सिद्दीक़-ए-अकबर
फिर उमर उस्मान-ओ-हैदर
भेजिये सलाम इन पर
दीन-ए-हक़ की ढाल दोनों
हैं ये बेमिसाल दोनों
फ़ातिमा के लाल दोनों
मुस्तफ़ा की आल दोनों
इस जहाँ से जब सफ़र हो
रू-ए-पाक पर नज़र हो
ये करम नसीर पर हो
उसका सर हो तेरा दर हो
अस्सलाम ऐ सब्ज़ गुम्बद के मकीन
अस्सलाम या रहमतल्लिल आलमीन
अस्सलाम ऐ सब रसूलों के रसूल
ये सलाम-ए-आजिज़ाना हो क़बूल
या इलाही वास्ता आल-ए-रसूल
ये सलाम-ए-आजिज़ाना हो क़बूल