आक़ा को पुकार बन्दे, आक़ा को पुकार
इन्शा अल्लाह हो जाएगा तेरा बेड़ा पार
आक़ा को पुकार बन्दे…
उनके हाथ में कुल कुंजी है रब ने उन्हें मुख़्तार किया
हम को उनका मंगता बनाया और उन्हें सरकार किया
जो सरकार के दर का गदा है वोह ख़ुद है मुख़्तार
आक़ा को पुकार बन्दे…
क्या कहना दरबार-ए-नबी का उसकी शान ही आली है
हरगिज़ न महरूम वोह लौटा उस दर का जो सवाली है
आओ चलें अब सू-ए-मदीना छोड़ के सब दरबार
आक़ा को पुकार बन्दे…
आ़ला हज़रत ने यारों ये सबक़ हमें सिखलाया है
जो गुस्ताख़-ए-ख़ुदा-ओ-नबी है अपना नहीं वोह पराया है
हाँ ऐसे गुस्ताख़ों पर मौला की है फिटकार
आक़ा को पुकार बन्दे…
अपनी तो पहचान यही है अपनी तो है शान यही
दामन में कुछ और नहीं है दिल में है अरमान यही
इतनी पढूं मैं उनकी ना’तें राज़ी हों सरकार
आक़ा को पुकार बन्दे…
क्यूँ ग़मगीन है तू ऐ ‘सय्यिद’ दर पर वोह बुलवाएंगे
रंज-ओ-ग़म सब दूर करेंगे सोई हुई क़िस्मत जगाएंगे
और भी कोई उनके सिवा है दुखियों का ग़म-ख़्वार
आक़ा को पुकार बन्दे…
याद-ए-नबी में तू ऐ ‘रज़वी’ उनकी मिदहत करता जा
दीवारों का दिल भर आए झूम के ना’तें पढ़ता जा
जल्द मदीने जाएगा तू लगते हैं आसार
आक़ा को पुकार बन्दे…