आसियों को दर तुम्हारा मिल गया

आसियों को दर तुम्हारा मिल गया,
बे-ठिकानों को ठिकाना मिल गया।

फ़ज़्ल-ए-रब से फिर कमी किस बात की,
मिल गया सब कुछ जो तैबा मिल गया।

उनके दर ने सब से मुस्तग़नी किया,
बे-तलब बे-ख्वाहिश इतना मिल गया।

ना-खुदाई के लिए आए हुज़ूर,
डूबतो! निकलो सहारा मिल गया।

आँखें पुर-नम हो गईं सर झुक गया,
जब तेरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा मिल गया।

तेरे दर के टुकड़े हैं और मैं ग़रीब,
मुझको रोज़़ी का ठिकाना मिल गया।

ऐ हसन! फिर क्यों न रीझें या जनाब,
हम को सहरा-ए-मदीना मिल गया।

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