mehr e roshan chup gaya

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है
जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है

हर शाम-ओ-सहर क़ुर्बां जिस पर दुनिया-ए-मसर्रत होती है
वो पैकर-ए-राहत क्या जाने कैसी शब-ए-फ़ुर्क़त होती है

ऐ वाइज़-ए-नादाँ करता है तू एक क़यामत का चर्चा
याँ रोज़ निगाहें मिलती हैं याँ रोज़ क़यामत होती है

करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आँसू
फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ से ऐ नादाँ तौहीन-ए-मोहब्बत होती है

वो पुर्सिश-ए-ग़म को आए हैं कुछ कह न सकूँ चुप रह न सकूँ
ख़ामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दूँ तो शिकायत होती है

ऐ दोस्त जुदाई में तेरी कुछ ऐसे भी लम्हे आते हैं
सेजों पे भी तड़पा करता हूँ काँटों पे भी राहत होती है

जो आ के रुके दामन पे ‘सबा’ वो अश्क नहीं है पानी है
जो अश्क न छलके आँखों से उस अश्क की क़ीमत होती है

Leave a Comment