तेरे जद की है बारहवीं ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तेरे जद की है बारहवीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !
मिली है तुझे ग्यारहवीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

कोई उन के रुत्बे को क्या जानता है
मुहम्मद के हैं जा-नशीं ग़ौस-ए-आ’ज़म

तू है नूर-ओ-आईना-ए-मुस्तफ़ाई
नहीं कोई तुझ सा हसीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

हुए औलिया ज़ी-शरफ़ गरचे लाखों
मगर सब से हैं बेहतरीं ग़ौस-ए-आ’ज़म

जहाँ औलिया करते हैं जब्हा-साई
वो बग़दाद की है ज़मीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तेरे रौज़ा-ए-पाक के देखने को
तड़पता है क़ल्ब-ए-हज़ीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

मुझे भी बुला लो, ख़ुदा-रा ! कि मैं भी
घिसूँ आस्ताँ पर जबीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

हमें भी बुला लो, ख़ुदा-रा ! कि हम भी
घिसें आस्ताँ पर जबीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

मेरे क़ल्ब का हाल क्या पूछते हो
ये दिल है मकाँ और मकीं ग़ौस-ए-आ’ज़म

जो अहल-ए-नज़र हैं, वही जानते हैं
कि हर दम हैं सब से क़रीं ग़ौस-ए-आ’ज़म

हमारी भी लिल्लाह बिगड़ी बना दो
ग़ुलामों के तुम हो मु’ईं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

हैं घेरे हुए चार जानिब से दुश्मन
ख़ुदा-रा बचा मेरा दीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

छुपा ले मुझे अपने दामन के नीचे
कि ग़म की घटाएँ उठीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

वो है कौन सा उन के दर का भिकारी
मददगार जिस के नहीं ग़ौस-ए-आ’ज़म

हुसैन-ओ-हसन की तो आँखों का तारा
वो ख़ातिम हैं और तू नगीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

हुकूमत तेरी नाफ़िज़ा है कि हक़ ने
तुझे दी है फ़त्ह-ए-मुबीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तुझे सब ने जाना, तुझे सब ने माना
तेरी सब में धूमें मचीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तू वो है तेरे पाक तलवे के आगे
खिंची गर्दनें झुक गईं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

न थे मुतलक़न औलिया जिस से वाक़िफ़
तुझे ने’मतें वो मिलीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

तेरी ज़ात से, ऐ शरी’अत के हामी !
तरीक़त की रम्ज़ें खुलीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

शरी’अत, तरीक़त के हर सिलसिले में
हैं तेरी ही नहरें बहीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

सलासिल की सब मंज़िलों में है फैली
तेरी रौशनी बिल-यक़ीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

ग़म-ओ-रंज में नाम तेरा लिया जब
तो कलियाँ दिलों की खिलीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

करम गर करो, मेरे मदफ़न में आओ
तो हो क़ब्र ख़ुल्द-ए-बरीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

इलाही ! तेरा कलमा-ए-पाक मुझ को
सिखाएँ दम-ए-वापसीं ग़ौस-ए-आ’ज़म

ब-सू-ए-जमील अज़-निगाह-ए-‘इनायत
ब-बीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म ! ब-बीं, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

वहाँ सर झुकाते हैं सब ऊँचे ऊँचे
जहाँ है तेरा नक़्श-ए-पा, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

हुसैन-ओ-हसन फूल बाग़-ए-नबी के
उसी बाग़ का तू है फल, ग़ौस-ए-आ’ज़म !

सरों पर जिसे लेते हैं ताज वाले
तुम्हारा क़दम है वो, या ग़ौस-ए-आ’ज़म !

दो ‘आलम में है कौन हामी हमारा
यहाँ ग़ौस-ए-आ’ज़म, वहाँ ग़ौस-ए-आ’ज़म

जमील ! आ’ला हज़रत के क़ुर्बान जाएँ
कि वो गुल हैं और उन में बू ग़ौस-ए-आ’ज़म

जमील ! अपने मुर्शिद के क़ुर्बान जाऊँ
कि वो गुल हैं और उन में बू ग़ौस-ए-आ’ज़म

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