मेरे कमली वाले की शान ही निराली है / Mere Kamli Waale Ki Shaan Hi Niraali Hai
मेरे कमली वाले की शान ही निराली है
दो-जहाँ के दाता हैं, सारा जग सवाली है
ख़ुल्द जिस को कहते हैं मेरी देखी-भाली है
सब्ज़ सब्ज़ गुम्बद है और सुनहरी जाली है
चाँद की तरह उन को हम कहें तो मुजरिम हैं
क्यूँ-कि उन की चौखट पर चाँद ख़ुद सवाली है
छाँव महकी महकी है, धूप ठंडी ठंडी है
शहर-ए-मुस्तफ़ा तेरी हर बात ही निराली है
वो बिलाल-ए-हब्सी हों या ओवैस-ए-करनी हों
उन पे मरने वालों की हर अदा निराली है
हर तरफ़ मदीने में भीड़ है फ़क़ीरों की
एक देने वाला है, कुल जहाँ सवाली है
हम गुनाहगारों को रब से बख़्शवा लेंगे
उन के रब ने कब उन की कोई बात टाली है
ये भी इक तवज्जोह है मेरे कमली वाले की
राज़ ! मैंने कुछ दिन से शक्ल ये बना ली है
शायर:
राज़ इलाहाबादी
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