Qasida Al-Burda Sharif (Poem of the Mantle): Lyrics & Information

क़सीदा अल-बुरदा शरीफ़ (Qasida Al-Burda): The Poem of the Mantle

क़सीदा अल-बुरदा (قصيدة البردة‎), जिसे आमतौर पर “बुरदा शरीफ़” के नाम से जाना जाता है, हुज़ूर नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शान में लिखा गया एक विश्व प्रसिद्ध क़सीदा है। इसे 7वीं सदी हिजरी में मिस्र के महान सूफ़ी शायर इमाम शरफुद्दीन अल-बुसीरी (रहमतुल्लाह अलैह) ने लिखा था। यह दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़े और याद किए जाने वाले कलामों में से एक है।

इस क़सीदे का असल नाम “अल-कवाकिब अद-दुर्रिया फ़ी मदह ख़ैर अल-बरिया” (الكواكب الدرية في مدح خير البرية) है, जिसका मतलब है “सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ की प्रशंसा में चमकते सितारे”।

यह कलाम अपने इस मतले (Refrain) के लिए सबसे ज़्यादा मशहूर है, जिसे हर शेर के बाद अक्सर पढ़ा जाता है:

مَولَاىَ صَلِّ وَسَلِّمْ دَائِمًا أَبَدًا
عَلَى حَبِيبِكَ خَيرِ الْخَلْقِ كُلِّهِمِ

“O Mawla, send peace and blessings always and forever,
Upon Your Beloved, the Best of All Creation.”

क़सीदे की संरचना (Structure of the Qasida)

 

क़सीदा बुरदा में कुल 10 अध्याय (Chapters) हैं। इमाम बुसीरी इसकी शुरुआत हुज़ूर (स.अ.व.) से अपनी मोहब्बत का इज़हार करके करते हैं। बीच के अध्यायों में हुज़ूर (स.अ.व.) की मुबारक ज़िंदगी, आपकी विलादत, आपके मुअजिज़ात (चमत्कार), क़ुरान की अज़मत, मेराज का सफ़र और जिहाद का ज़िक्र है। आख़िरी अध्यायों में इमाम बुसीरी ने हुज़ूर (स.अ.व.) से शफ़ाअत और अल्लाह की रहमत की इल्तिजा की है।

  1. इश्क़ और मोहब्बत का इज़हार
  2. नफ़्स की ख़्वाहिशात से ख़बरदार करना
  3. नबी-ए-करीम (स.अ.व.) की तारीफ़
  4. नबी-ए-करीम (स.अ.व.) की विलादत (जन्म)
  5. नबी-ए-करीम (स.अ.व.) के मुअजिज़ात (चमत्कार)
  6. क़ुरान-ए-पाक की अज़मत
  7. नबी-ए-करीम (स.अ.व.) का मेराज का सफ़र
  8. नबी-ए-करीम (स.अ.व.) का जिहाद
  9. नबी-ए-करीम (स.अ.व.) के वसीले से शफ़ाअत तलब करना
  10. दुआ और ज़रूरतों का बयान

बुरदा शरीफ़ की कहानी (The Burda’s Story)

इमाम बुसीरी एक बहुत ही तकलीफ़देह बीमारी (फ़ालिज) में मुब्तिला हो गए थे। उन्होंने अल्लाह की मग़फ़िरत और हुज़ूर (स.अ.व.) की शफ़ाअत की नियत से इस क़सीदे को लिखना शुरू किया। इसे लिखने के बाद, उन्होंने ख़्वाब में हुज़ूर नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा, जिन्होंने इमाम बुसीरी को अपनी मुबारक चादर (बुरदा) से ढँक दिया। जब वो सुबह बेदार हुए, तो वो अपनी बीमारी से पूरी तरह शिफ़ा पा चुके थे।

शायर के बारे में: इमाम अल-बुसीरी

आपका पूरा नाम मुहम्मद इब्न सईद अल-बुसीरी था। आप 608 हिजरी में मिस्र में पैदा हुए। आप इल्म और अदब के माहिर थे और ख़ुशनवीसी (Calligraphy) में भी कमाल रखते थे। अपनी ज़िंदगी के आख़िरी हिस्से में उन्होंने अपनी पूरी शायरी को हुज़ूर (स.अ.व.) की शान में वक़्फ़ कर दिया। आपका विसाल 694 हिजरी में हुआ।

ज़रूरी लिंक्स (Important Resources)

 

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