अगर क़िस्मत से मैं उन की गली में ख़ाक हो जाता
ग़म-ए-कौनैन का सारा बखेड़ा पाक हो जाता
लब-ए-जाँ-बख़्श की क़ुर्बत हयात-ए-जाविदाँ देती
अगर डोरा नफ़्स का रेशा-ए-मिस्वाक हो जाता
हुआ दिल सोख़तों को चाहिए थी उन के दामन की
इलाही सुब्ह-ए-महशर का गरेबाँ चाक हो जाता
अगर पैवंद मल्बूस-ए-पयम्बर के नज़र आए
तिरा ऐ हुलिया-ए-शाही कलेजा चाक हो जाता
कमाँ-दार नुबुव्वत क़ादर-अंदाज़ में यक्ता हैं
दो ‘आलम क्यूँ न उन का बस्ता-ए-फ़ितराक हो जाता
न होती शाक़ गर दर की जुदाई तेरे ज़र्रे को
क़मर इक और भी रौशन सर-ए-अफ़्लाक हो जाता
‘हसन’ अहल-ए-नज़र ‘इज़्ज़त से आँखों में जगह देते
अगर ये मुश्त-ए-ख़ाक उन की गली की ख़ाक हो जाता
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